बुधवार, 5 सितंबर 2012
मंगलवार, 26 जून 2012
गज़ल
वो एक नूर का झरना है जो मचलता है ,किसी दिये सा मेरी जिंदगी में जलता है!
किसी के ग़म का धुआं रोज़ उड़ के आता है,
जो आंसुओं की तरह आँख में पिघलता है !
वो बस गया मेरी आँखों में ख़्वाब की सूरत ,
किसी ख्याल सा दिल में भी मेरे पलता है !
जो इक कदम ना चला साथ मेरे सहरा में,
उसी के साये में रहने को दिल मचलता है!
वो आसमां की तरह साथ जागता है मेरे,
हर इक सफ़र में मेरे साथ साथ चलता है!
वो ढल गया मेरे गीतों में इक तरन्नुम सा ,
वो दर्द बन के मेरे शेर में भी ढलता है !
है "प्रेम" इश्क की इक लौ जली हुई मुझ में
दिया फ़कीर की कुटिया में जैसे जलता है!
शनिवार, 9 जून 2012
ग़ज़ल
अदाए हुस्न जब आवारा हुई!
वफाये इश्क तब आवारा हुई!
हयात-ओ मौत के के मसअले पर
जिंदगी बेसबब आवारा हुई!
ज़रब अपने रफू जो करने लगे,
तेग उनकी -गज़ब आवारा हुई!
आशनाई बनी जो दुश्मने जाँ,
आशिकी जाने कब आवारा हुई!
ना उम्मीदी के जख्म रिसने लगे,
कोशिशें सब की सब आवारा हुई!
दीदा-ए-तर छुपा ली पलकों में
दूदे दिल की कर्ब आवारा हुई!
शर्म से उसने डाली रुख पे नक़ाब,
देखने की तलब आवारा हुई !
यूँ कसे साज़े ज़िन्दगी के तार,
बजते बजते तरब आवारा हुई !
तिश्नगी हद से बढ़ गयी तब “प्रेम”
झील सी आँखें जब आवारा हुई!
ज़रब= जख्म कर्ब=व्याकुलता ,पीड़ा दुःख , दूदे-दिल =दिल का धुआं तरब=साज़ की मुख्य तार
वफाये इश्क तब आवारा हुई!
हयात-ओ मौत के के मसअले पर
जिंदगी बेसबब आवारा हुई!
ज़रब अपने रफू जो करने लगे,
तेग उनकी -गज़ब आवारा हुई!
आशनाई बनी जो दुश्मने जाँ,
आशिकी जाने कब आवारा हुई!
ना उम्मीदी के जख्म रिसने लगे,
कोशिशें सब की सब आवारा हुई!
दीदा-ए-तर छुपा ली पलकों में
दूदे दिल की कर्ब आवारा हुई!
शर्म से उसने डाली रुख पे नक़ाब,
देखने की तलब आवारा हुई !
यूँ कसे साज़े ज़िन्दगी के तार,
बजते बजते तरब आवारा हुई !
तिश्नगी हद से बढ़ गयी तब “प्रेम”
झील सी आँखें जब आवारा हुई!
ज़रब= जख्म कर्ब=व्याकुलता ,पीड़ा दुःख , दूदे-दिल =दिल का धुआं तरब=साज़ की मुख्य तार
लिक्खे हें हथेली पर हंस हंस के सितम हमने,
दिल के इस आँगन में दफनाए हैं गम हमने!
पथराव की बारिश को सहते हुए सीने पर,
रक्खे हैं आईनों के कितने ही भरम हमने !
हालात के तूफां हों या दर्द की आंधी हों,
हर हाल में जीने कि खाई है कसम हमने!
जख्मों की कहानी तो सिमटी है दो अश्कों में,
हर गम के फ़साने को कर डाला है कम हमने!
नादानी नहीं है ये ,रिश्तों की ज़रूरत है,
हाँ उनके सितम को भी माना है करम हमने!
की तुमने तो बेरहमी अपने ही अज़ीज़ों से,
ता-उम्र किये लेकिन गैरों पे रहम हमने!
तकदीर को तोहमत अब किस ह्क़ से 'प्रेम ' हम दें ,
जब खुद ही तराशे है पत्थर के सनम हमने !
दिल के इस आँगन में दफनाए हैं गम हमने!
पथराव की बारिश को सहते हुए सीने पर,
रक्खे हैं आईनों के कितने ही भरम हमने !
हालात के तूफां हों या दर्द की आंधी हों,
हर हाल में जीने कि खाई है कसम हमने!
जख्मों की कहानी तो सिमटी है दो अश्कों में,
हर गम के फ़साने को कर डाला है कम हमने!
नादानी नहीं है ये ,रिश्तों की ज़रूरत है,
हाँ उनके सितम को भी माना है करम हमने!
की तुमने तो बेरहमी अपने ही अज़ीज़ों से,
ता-उम्र किये लेकिन गैरों पे रहम हमने!
तकदीर को तोहमत अब किस ह्क़ से 'प्रेम ' हम दें ,
जब खुद ही तराशे है पत्थर के सनम हमने !
बुधवार, 2 मई 2012
ग़ज़ल
शनासा ही नहीं थे जो वफ़ा से,
हुए वो पेश-ए-खिदमत किस अदा से,
हमारे अज़ल पर वोह मुस्कराए
रहे डरते जो अहसासे अफ़ा से

किया उल्फत को जब जिसने भी रुसवा,
नहीं वो बच सका खुद कि ज़फा से,
मोहब्बत तो है मीराज़े मुक़द्दस,
पड़ेगा खेलना सिद्द्को सफा से,
हवस की आग है रंगीन लेकिन,
संभल कर खेलना उलटी हवा से,
वो कैसे कैफियत समझे किसी की,
नहीं वाकिफ है जो अपनी खता से,
जो आया खुद-ब-खुद इक ख्वाब बनकर,
कहाँ आया कभी मेरी रजा से,
सफीना इश्क कहते हैं जिसे हम,
कभी निकला न गरदाबे बला से,
चले थे खेलने उल्फत कि बाज़ी,
रहे जो "प्रेम" से हरदम ख़फा से....प्रेम लता
शनासा ही नहीं थे जो वफ़ा से,
हुए वो पेश-ए-खिदमत किस अदा से,
हमारे अज़ल पर वोह मुस्कराए
रहे डरते जो अहसासे अफ़ा से

किया उल्फत को जब जिसने भी रुसवा,
नहीं वो बच सका खुद कि ज़फा से,
मोहब्बत तो है मीराज़े मुक़द्दस,
पड़ेगा खेलना सिद्द्को सफा से,
हवस की आग है रंगीन लेकिन,
संभल कर खेलना उलटी हवा से,
वो कैसे कैफियत समझे किसी की,
नहीं वाकिफ है जो अपनी खता से,
जो आया खुद-ब-खुद इक ख्वाब बनकर,
कहाँ आया कभी मेरी रजा से,
सफीना इश्क कहते हैं जिसे हम,
कभी निकला न गरदाबे बला से,
चले थे खेलने उल्फत कि बाज़ी,
रहे जो "प्रेम" से हरदम ख़फा से....प्रेम लता
गुरुवार, 19 अप्रैल 2012
रूदाद-ऐ-मोहब्बत

जी हां मैं मोहब्बत हूं
रब के पैरों कि आहट हूं,
बेचैन दिलों की राहत हूं!
मैं हर पाकीज़ा रिश्ते के,
अस्सास में बसी जरूरत हूँ!
जी हाँ मैं मोहब्बत हू!
कुदरत की एन हकीकत हूँ,
मंदिर की एक इबादत हूँ!
रूहों की पाक अमानत हूँ,
मैं हर तायत की लज़्ज़त हूं!
जी हाँ मैं मोहब्बत हूँ!
दिलबर की जुस्तजू में हूं,
हमदम की गुफ़्तगू में हूँ !
मैं फूलों की ख़ुशबू में हूं!
मैं ही आबे जेहूँ में हूँ!
जी हाँ मैं मोहब्बत हूँ!
मैं गुलों में और गुलज़ारों में,
मैं पायल की झंकारों में!
मैं मेहरो –माह सितारों में,
कुदरत के हंसी नजारों मैं!
जी हाँ मैं मोहब्बत हूँ!
सदियों से बादल से मिलकर,
मैं दमक रही बजली बन कर!
और बन कर ज़िया सितारों की,
में चमक रही हूं अम्बर पर !
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
सब ऋतुओं में मधुमास हूं मैं,
भँवरे के दिल की प्यास हूं मैं!
नाज़ुक दिल का अहसास हूं मैं,
इक टूटे दिल की आस हूं मैं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
आगाज़ हूं मैं अंजाम हूं मैं,
आरज़ू हूं मैं अरमान हूं मैं!
इखलाक भी मैं ईमान भी मैं,
इकरार भी मैं इत्माम भी मैं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
वारिस शाह के फरमान में हूं,
और बुल्लेह शाह के गान में हूं!
मैं गुरु ग्रन्थ के ज्ञान में हूं,
मैं गीता और कुरान में हूं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
मैं शम्मा में परवानो में,
मैं हूँ मुरली की तानो में!
मैं आशिक के अरमानो में,
मैं इश्क के हूं अफ़सानों में!
जी हां मैं मोहब्बत हूं
मैं हीरों के दिल में बसती,
रांझे की बंसी में बजती!
बेवा के बैनो में रोती,
शादी के गीतों में हँसती!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
जूलियट के इंतज़ार में हूं,
रोमिओं के ऐतबार में हूं !
मैं कोहकन के इकरार में हू,
लैला की हर पुकार में हूं !
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
क़ातिब भी हूं किताब भी हूं,
शागिर्द भी हूं उस्ताद भी हूं!
हँसते दिल की आवाज़ भी हूं,
शीरीं भी हूं फरहाद भी हूं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
मैं इश्क भी हूं मैं आशिक भी,
आलम भी हूं आराईश भी !
मैं ख़ुदा की हसीं इनायत भी,
प्यासी रूहों की ज़रूरत भी!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
मैं ही मकीन मैं ही मकान,
मैं ही धरती और आस्मान!
और देख ज़रा इतिहास में भी,
थे बादशाह मेरे गुलाम !
जी हां मै मोहब्बत हूं!
पर आज मेरा क्या हाल हुआ,
हर दिल से मुझे निकाल दिया!
मैं रह गयी सिर्फ किताबों में,
गीतों-नग़मों में ढाल दिया!
जी हां मैं मोहब्बत हूं
मैं आ पहुंची व्योपारों में,
पैसों में और दीनारों में!
सिक्कों में मुझ को तोल रहे,
बिक गयी मैं आज बाज़ारों में!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
दिल से जो मुझे मिटाओगे,
इख़लास से जो गिर जाओगे!
तब एक बात लाज़िम जानो,
तुम सकूं कभी न पाओगे!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
जो मुझ को भूल गया इंसां,
तू पारसाई को तरसेगा!
इस ज़ोर सितम कि दुनिया में,
फिर मेहरो वफ़ा को तरसेगा!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
जो रही चमन में ऐसी हवा,
सब गुन्चे ख़ुशबू खोयेंगे!
फिर देखेगा तुसामी कई,
चारों उन्सर तब रोयेंगे!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
तस्कीने आलम जो चाहो ,
बस रस्मे वफ़ा निभाओ तुम!
इस ज़ुल्म जफा सब को छोडो,
बस मुझ को गले लगाओ तुम!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
है मेरा तुम से वादा यह ,
आलम में खुशियाँ भर दूँगी!
मुस्काएगा गोशा गोशा,
और हुस्ने बहाराँ कर दूँगी!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!....प्रेम लता
बेचैन दिलों की राहत हूं!
मैं हर पाकीज़ा रिश्ते के,
अस्सास में बसी जरूरत हूँ!
जी हाँ मैं मोहब्बत हू!
कुदरत की एन हकीकत हूँ,
मंदिर की एक इबादत हूँ!
रूहों की पाक अमानत हूँ,
मैं हर तायत की लज़्ज़त हूं!
जी हाँ मैं मोहब्बत हूँ!
दिलबर की जुस्तजू में हूं,
हमदम की गुफ़्तगू में हूँ !
मैं फूलों की ख़ुशबू में हूं!
मैं ही आबे जेहूँ में हूँ!
जी हाँ मैं मोहब्बत हूँ!
मैं गुलों में और गुलज़ारों में,
मैं पायल की झंकारों में!
मैं मेहरो –माह सितारों में,
कुदरत के हंसी नजारों मैं!
जी हाँ मैं मोहब्बत हूँ!
सदियों से बादल से मिलकर,
मैं दमक रही बजली बन कर!
और बन कर ज़िया सितारों की,
में चमक रही हूं अम्बर पर !
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
सब ऋतुओं में मधुमास हूं मैं,
भँवरे के दिल की प्यास हूं मैं!
नाज़ुक दिल का अहसास हूं मैं,
इक टूटे दिल की आस हूं मैं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
आगाज़ हूं मैं अंजाम हूं मैं,
आरज़ू हूं मैं अरमान हूं मैं!
इखलाक भी मैं ईमान भी मैं,
इकरार भी मैं इत्माम भी मैं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
वारिस शाह के फरमान में हूं,
और बुल्लेह शाह के गान में हूं!
मैं गुरु ग्रन्थ के ज्ञान में हूं,
मैं गीता और कुरान में हूं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
मैं शम्मा में परवानो में,
मैं हूँ मुरली की तानो में!
मैं आशिक के अरमानो में,
मैं इश्क के हूं अफ़सानों में!
जी हां मैं मोहब्बत हूं
मैं हीरों के दिल में बसती,
रांझे की बंसी में बजती!
बेवा के बैनो में रोती,
शादी के गीतों में हँसती!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
जूलियट के इंतज़ार में हूं,
रोमिओं के ऐतबार में हूं !
मैं कोहकन के इकरार में हू,
लैला की हर पुकार में हूं !
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
क़ातिब भी हूं किताब भी हूं,
शागिर्द भी हूं उस्ताद भी हूं!
हँसते दिल की आवाज़ भी हूं,
शीरीं भी हूं फरहाद भी हूं!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
मैं इश्क भी हूं मैं आशिक भी,
आलम भी हूं आराईश भी !
मैं ख़ुदा की हसीं इनायत भी,
प्यासी रूहों की ज़रूरत भी!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
मैं ही मकीन मैं ही मकान,
मैं ही धरती और आस्मान!
और देख ज़रा इतिहास में भी,
थे बादशाह मेरे गुलाम !
जी हां मै मोहब्बत हूं!
पर आज मेरा क्या हाल हुआ,
हर दिल से मुझे निकाल दिया!
मैं रह गयी सिर्फ किताबों में,
गीतों-नग़मों में ढाल दिया!
जी हां मैं मोहब्बत हूं
मैं आ पहुंची व्योपारों में,
पैसों में और दीनारों में!
सिक्कों में मुझ को तोल रहे,
बिक गयी मैं आज बाज़ारों में!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
दिल से जो मुझे मिटाओगे,
इख़लास से जो गिर जाओगे!
तब एक बात लाज़िम जानो,
तुम सकूं कभी न पाओगे!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
जो मुझ को भूल गया इंसां,
तू पारसाई को तरसेगा!
इस ज़ोर सितम कि दुनिया में,
फिर मेहरो वफ़ा को तरसेगा!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
जो रही चमन में ऐसी हवा,
सब गुन्चे ख़ुशबू खोयेंगे!
फिर देखेगा तुसामी कई,
चारों उन्सर तब रोयेंगे!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
तस्कीने आलम जो चाहो ,
बस रस्मे वफ़ा निभाओ तुम!
इस ज़ुल्म जफा सब को छोडो,
बस मुझ को गले लगाओ तुम!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!
है मेरा तुम से वादा यह ,
आलम में खुशियाँ भर दूँगी!
मुस्काएगा गोशा गोशा,
और हुस्ने बहाराँ कर दूँगी!
जी हां मैं मोहब्बत हूं!....प्रेम लता
तू मसीहा है मेरा या कि फ़रिश्ता तू है,
हाँ अज़ल से ही मेरी रूह में रहता तू है!
बेवफ़ा सब हैं मेरे वास्ते इस दुनियां में,
बावफायी को मगर देखूं तो दिखता तू है!
ज़ख्म सहराओं कि मानिंद मेरे है लेकिन,
मेरी रग रग में यह लगता है कि बहता तू है!
हाथ फैला के तेरे आगे खुदा क्या मांगूं ,
जानती हूँ कि मेरे हक़ में सोचता तू है !
मेरे होंटो के तरानों में लिखी ख़ामोशी,
ऐसी ख़ामोशी जिसे गौर से सुनता तू है!
जिंदगी कि स्याह रातों में डर लगता था ,
चांदनी ले के जो आई है वह जिया तू है !
सकूतेयास मेरी जिंदगी का था हर साज़,
जो नगमा प्यार का छेड़े वो दिलरुबा तू है!
धूप तीखी थी न साया था कोई रस्ते में ,
फलक पे " प्रेम " के छाई जो वो घटा तू है....प्रेम लता
हाँ अज़ल से ही मेरी रूह में रहता तू है!
बेवफ़ा सब हैं मेरे वास्ते इस दुनियां में,
बावफायी को मगर देखूं तो दिखता तू है!ज़ख्म सहराओं कि मानिंद मेरे है लेकिन,
मेरी रग रग में यह लगता है कि बहता तू है!
हाथ फैला के तेरे आगे खुदा क्या मांगूं ,
जानती हूँ कि मेरे हक़ में सोचता तू है !
मेरे होंटो के तरानों में लिखी ख़ामोशी,
ऐसी ख़ामोशी जिसे गौर से सुनता तू है!
जिंदगी कि स्याह रातों में डर लगता था ,
चांदनी ले के जो आई है वह जिया तू है !
सकूतेयास मेरी जिंदगी का था हर साज़,
जो नगमा प्यार का छेड़े वो दिलरुबा तू है!
धूप तीखी थी न साया था कोई रस्ते में ,
फलक पे " प्रेम " के छाई जो वो घटा तू है....प्रेम लता
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