रविवार, 21 अगस्त 2016

Ghazal
कुछ ऐसा शौक-ए-नज़्ज़ारा हुआ है
कि हर चेहरा तिरा साया हुआ है...
kuchh aisa shauk-e-nazzara hua hai
ki har chehra tira Saaya hua hai

छिपाया मुद्दतों जो राज़ दिल में
उसी का हर गली चर्चा हुआ है
chhipaaya muddtoN jo raaz dil mein
usi ka har gali chrcha hua hai

कोई न कर्ब का मफ़हूम समझे
न जाने आदमी को क्या हुआ है
koi na drd ka maphhhom samjhe
na jaane aadmi ko kya hua hai

जहाँ को बांटता था रौशनी जो
वो सूरज दार पर लटका हुआ है
jahaaN ko baanta thaa Rashni jo
vo sooraj daar par latka hua hai

सदायें हैं या चीख़ें हैं किसी की
न जाने कौन किस को ढूढता है
sadaayeN hain ya cheekheN hain kisi ki
na jaane kaun kis ko dhoondhta hai

मुहब्बत का जनाज़ा उठ चुका है
न जाने आशिक़ी को क्या हुआ है
muhabbat ka janaaza uth chukka hai
na jaane aashiqi ko kya hua hai

©Prem Lata Sharma……10/12//2015