गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

तू मसीहा है मेरा या कि फ़रिश्ता तू है,
हाँ अज़ल से ही मेरी रूह में रहता तू है!

बेवफ़ा सब हैं मेरे वास्ते इस दुनियां में,
बावफायी को मगर देखूं तो दिखता तू है!

ज़ख्म सहराओं कि मानिंद मेरे है लेकिन,
मेरी रग रग में यह लगता है कि बहता तू है!

हाथ फैला के तेरे आगे खुदा क्या मांगूं ,
जानती हूँ कि मेरे हक़ में सोचता तू है !

मेरे होंटो के तरानों में लिखी ख़ामोशी,
ऐसी ख़ामोशी जिसे गौर से सुनता तू है!

जिंदगी कि स्याह रातों में डर लगता था ,
चांदनी ले के जो आई है वह जिया तू है !

सकूतेयास मेरी जिंदगी का था हर साज़,
जो नगमा प्यार का छेड़े वो दिलरुबा तू है!

धूप तीखी थी न साया था कोई रस्ते में ,
फलक पे " प्रेम " के छाई जो वो घटा तू है....प्रेम लता