शनिवार, 3 नवंबर 2012


ग़ज़ल
 
रु-ब-रु एक ऐसा  साया था
जिस से फूलों ने रंग पाया था  

उसके आने से सारा आलम भी
चाँद  के नूर में नहाया था

कोई खिड़की न कोई दर था खुला
और वो रूह में समाया था

उसकी खुशबू की प्यास थी लब पर
ज़हन –ओ-दिल पे नशा सा छाया था

दर्द से टूट कर कोई टुकड़ा
दिल की वादी में आज आया था


जब भी पूछा स्वाल उल्फत का
खिज़ल
सा हो के  मुस्कुराया था
 
तुम ही तूफां से जा के टकराओ  
इश्क ने हम को यह बताया था  


हिज्र के रंग में पुरनम आँखें
कोई जलता सा राग गाया  था
 मैं थी  सीपी वो आब-ए-नीसा था 
मैंने  गूहर उसे  बनाया था
 
आइना जैसी जात थी उसकी  
“प्रेम” हस्ती में उसको पाया था

प्रेम लता  
नवम्बर १, २०१२   


शनिवार, 20 अक्तूबर 2012


ग़ज़ल

जल बुझा दिल मगर शरारे अभी बाकी हैं
संभल के छेड़ना अंगारे अभी बाकी हैं

जनूने इश्क के फसाद में ता-उम्र लुटे
इम्तिहाँ और भी हमारे अभी बाकी हैं
 
तमाशा जारीं है ऐ दोस्तो अभी  ठहरो
मेरी रुसवाई के नज़ारे  अभी बाकी हैं
 
कैसी ग़रक़ाब हुई जाती है दिल की कश्ती
उफ़नती मौजें, तेज़ धारे अभी बाकी हैं
 

ऐ हसीं ख़्वाब थोड़ी देर अभी रुक जाओ    
 फ़लक़ में देर है सितारे अभी बाकी हैं 

फ़िज़ा में तुन्द हवाएं हैं रक्सां देख ज़रा
तूफ़ान आने के इशारे अभी बाकी हैं

शोला-ए-प्रेम को
आतिश की ज़रूरत क्यों हो  
सुलगते  ज़ख्मो के सहारे अभी बाकी हैं.......प्रेम लता


रक्सां = तांडव नाचती    फ़लक़ = सुबह  तुन्द = उलटी  ग़रक़ाब = डूबना
ग़ज़ल      Sep 17, 2012
 
मिली सच बोलने की यह सज़ा  है,
कि हर इक शख्स मुझसे ही ख़फा है!

मेरी हर आह  पर कहती है दुनियां,
कि सच्चे प्यार का यह ही सिला है!

जियो कहकर किया तर्के-रिफाक़त
दुआ है या  कोई
 यह  बद्दुआ है

अदब सीखा है हमने क्यों वफ़ा का
उन्हें सब से बड़ा ये  ही गिला है
 
दिया है “प्रेम” को हर जख्म जिसने  
यह दिल अब तक उसे ही ढूँढता है


ग़ज़ल

करिया
- जां में ख़ामोशी है अभी
दिल में इक हूक सी उठी है अभी
 
अब्र से कह दो टूटकर बरसे
प्यास सहराओं की जगी है अभी
 
तेरे दिल से जो आशनाई थी  
मेरी रूह में उतर गयी है अभी
 
तुम अभी से पलक भिगोने लगे
दास्तां दर्द की पड़ी है अभी

तेरा दामन भीग जाए कहीं
चश्म--पुरनम झुकी हुई है अभी
 
रफ़्ता रफ़्ता यकीन आएगा
इश्क की हर अदा नई है अभी

तेरी खुशबू से मेरी सांसों की  
गुफ्तगू सी कोई हुई है अभी
 
कैसे हो जिंदगी खिलाफे जहां
तेरा ही ग़म उठा रही है अभी

हम से पूछो ना प्रेम “के किस्से
हम पे दीवानगी चढ़ी है अभी
 
१०/१८ /२०१२ .........प्रेम लता
ग़ज़ल
दिल लिया नींद भी ली चैन चुराया तुमने ,
इक गुनाह और करो मुझ से चुरा लो मुझ को!
जिस्म हस्सास हुआ रूह भी ज़ख्मी है बहुत,
आज तो अपने ही साये में छिपा लो मुझ को!
तुम हकीकत में नहीं ख़्वाब में जीते हो चलो,
बना के ख़्वाब  ही पलकों पे सजा लो मुझ को!
कभी इक बार तो तुम खुद में मुझे जीने दो,
अपनी सांसों का कोई लम्हा बना लो मुझ को!  
तू ग़ज़लकार  है सुनते हैं बहुत नाम तेरा,
अपनी ग़ज़लों में छिपे सोज़ में ढालो मुझ को

!
जिस किसी मोड़ पे तुमने हमे छोड़ा था कभी,
वहीँ बुत बन गये हैं आओ  जगा लो मुझ को!

मुझ में ताक़त नहीं है  तुम से जुदा रहने की,
मान ली हार ,इम्तिहा में ना डालो मुझ को!


रब्ब ने तो प्रेमका इक कतरा बनाया था मुझे,
तुम समंदर कि तरह खुद में समा लो मुझ को!

शनिवार, 15 सितंबर 2012

ग़ज़ल

किसको खुद में ढूंढ रहा हू

रूह से जैसे बिछुड़ गया हूँ
 
बिन साये के खड़ा धूप में
अपना साया ढूंढ रहा हूँ
पत्ती पत्ती होकर बिखरा
खुशबू अपनी ढूंढ रहा हूँ
अपना पता कहीं खो बैठा
अब दुनियां में ढूंढ रहा हूँ
दुनियां के मेले में यारो
अपने जैसा ढूंढ रहा हूँ
 
घर का या मंदिर का पत्थर
अब रस्ते में पड़ा हुआ हूँ

सहरा सहरा भटक रहा हूँ
क़तरा पानी ढूंढ रहा हू
कब से चाक गिरेबां होकर
कोई मकतल ढूंढ रहा हूँ

मुद्दत से हूँ कफन को ओढ़े
अपना कातिल ढूंढ रहा हूँ
 
"प्रेम" की प्यास बुझा दे कोई
ऐसा दरिया ढूंढ  रहा हूँ

मंगलवार, 26 जून 2012

गज़ल
वो एक नूर का झरना है जो मचलता है ,
किसी दिये सा मेरी जिंदगी में जलता है!

किसी के ग़म का धुआं रोज़ उड़ के आता है,
 जो आंसुओं की तरह आँख में पिघलता है !

वो बस गया मेरी आँखों में ख़्वाब की सूरत ,
किसी ख्याल सा दिल में भी मेरे पलता है !

जो इक कदम ना चला साथ मेरे सहरा में,
उसी के साये में रहने को दिल मचलता है!

वो आसमां की तरह साथ जागता है मेरे,
हर इक सफ़र में मेरे साथ साथ चलता है!

वो ढल गया मेरे गीतों में इक तरन्नुम सा ,
वो दर्द बन के मेरे शेर में भी ढलता है !

 है "प्रेम" इश्क की इक लौ जली हुई मुझ में 
दिया फ़कीर की कुटिया में जैसे जलता है!
 

शनिवार, 9 जून 2012

ग़ज़ल
अदाए हुस्न जब आवारा हुई!
वफाये इश्क तब आवारा हुई!


हयात-ओ मौत के के मसअले पर
जिंदगी बेसबब आवारा  हुई!

ज़रब अपने रफू जो करने लगे,
तेग उनकी -गज़ब आवारा हुई!

आशनाई बनी  जो दुश्मने जाँ,
आशिकी जाने कब आवारा हुई!

ना उम्मीदी के जख्म रिसने लगे,
कोशिशें सब की सब आवारा हुई!

दीदा-ए-तर  छुपा ली पलकों में
दूदे दिल की कर्ब आवारा हुई!

शर्म से उसने डाली रुख पे नक़ाब,
देखने की तलब आवारा हुई !

यूँ  कसे साज़े ज़िन्दगी के तार,
बजते बजते तरब आवारा हुई !

तिश्नगी हद से बढ़ गयी तब “प्रेम”
झील सी आँखें जब  आवारा हुई!


ज़रब= जख्म कर्ब=व्याकुलता ,पीड़ा दुःख , दूदे-दिल =दिल का धुआं तरब=साज़ की मुख्य तार