शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

ग़ज़ल      Sep 17, 2012
 
मिली सच बोलने की यह सज़ा  है,
कि हर इक शख्स मुझसे ही ख़फा है!

मेरी हर आह  पर कहती है दुनियां,
कि सच्चे प्यार का यह ही सिला है!

जियो कहकर किया तर्के-रिफाक़त
दुआ है या  कोई
 यह  बद्दुआ है

अदब सीखा है हमने क्यों वफ़ा का
उन्हें सब से बड़ा ये  ही गिला है
 
दिया है “प्रेम” को हर जख्म जिसने  
यह दिल अब तक उसे ही ढूँढता है