शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

ग़ज़ल
दिल लिया नींद भी ली चैन चुराया तुमने ,
इक गुनाह और करो मुझ से चुरा लो मुझ को!
जिस्म हस्सास हुआ रूह भी ज़ख्मी है बहुत,
आज तो अपने ही साये में छिपा लो मुझ को!
तुम हकीकत में नहीं ख़्वाब में जीते हो चलो,
बना के ख़्वाब  ही पलकों पे सजा लो मुझ को!
कभी इक बार तो तुम खुद में मुझे जीने दो,
अपनी सांसों का कोई लम्हा बना लो मुझ को!  
तू ग़ज़लकार  है सुनते हैं बहुत नाम तेरा,
अपनी ग़ज़लों में छिपे सोज़ में ढालो मुझ को

!
जिस किसी मोड़ पे तुमने हमे छोड़ा था कभी,
वहीँ बुत बन गये हैं आओ  जगा लो मुझ को!

मुझ में ताक़त नहीं है  तुम से जुदा रहने की,
मान ली हार ,इम्तिहा में ना डालो मुझ को!


रब्ब ने तो प्रेमका इक कतरा बनाया था मुझे,
तुम समंदर कि तरह खुद में समा लो मुझ को!