मंगलवार, 17 सितंबर 2013


ग़ज़ल

आज मिलने मुझे कुछ दर्द पुराने आये
मेरी रातों  के अंधेरों को बढ़ाने आये

 
कैसे नाकाम हुई हसरतें इक इक करके
फिर से माज़ी की कोई चाप सुनाने आये

जिस्म का प्यार कोई प्यार नहीं होता है
प्यार का कोई मसीहा यह पढ़ाने आये


बड़ी मुश्किल से सुलाई थी तमन्ना उनकी 
झूठे जलवों से मुझे फिर से लुभाने आये


करके बर्बाद मुझे माँगा है चाहत का हिसाब
आज फिर रूह को बस जिस्म बनाने आये


अब तो पलकों पे ही पथरा गए आंसू मेरे
तन्ज़ दे दे के मुझे फिर से रुलाने आये


कितनी ख़ामोश थी अहसास कि दुनिया मेरी
फिर से सन्नाटों में कोहराम मचाने आये

प्रेम लता शर्मा ......१४/०६/२०१३