मंगलवार, 8 जनवरी 2013


ग़ज़ल ………बहर हाज़ाज
यह आँखों में है क्यों ढलका समंदर  क्या बताएं हम

है  कैसी कशमकश यह दिल के अंदर क्या बताएं हम

गिरी थी  बिजलियाँ तो टूटकर मेरे नशेमन पर  
रकीबों का यह कैसें जल गया घर क्या बताएं हम   

सभी के पांव के नीचे ज़मीं तों एक जैसी है
तो क्यों है मुख्तलिफ सबका मुकद्दर क्या बताएं हम

तस्सवुर की  लकीरों से हजारों अक्स बनते हैं
है कितना गहरा इन यादों का सागर क्या बताएं हम   

किसी बे-सिम्त मंजिल के मुसाफिर हो गये जैसे  
क्यों भटका सा यहाँ हर इक बशर है क्या बताएं हम  ,

मिलाया जाने किसने ज़हर इस आलम की मिट्टी में
कि क्यों काला पड़ा हर इक शजर है क्या बताए हम  

हर इक चेहरे पे बरपी है अजब इक बदहवासी सी
 
सोराबों में भटकती क्यों  नज़र है, क्या बताएं हम
 
यह किसके नक्शे पा पर “प्रेम” ने सिर रख दिया अपना   
कोई दैरो-हरम सी ही  डगर है  क्या बताएं हम

प्रेम लता
जनवरी ८, २०१३