रविवार, 21 अगस्त 2016

ख़्याल

ख़्याल दोस्त भी दुश्मन भी बन के आते हैं
किसी को याद करते हैं किसी को भूल जाते है
...
अपनी रुसवाइयों पे चुपके से रोते हैं कभी
लिपट के मीठी यादों से कभी यह मुस्कुराते हैं

कभी फ़ूलों से खेलते हैं यह ख़ुशबू की तरह
जलते मौसम को बारिशों में ढाल जाते हैं

तारीक़ रातों में जलते हैं जुगनुओं की तरह
सुबह की रौशनी में फिर ख़ुद ही डूब जाते

छलक से जाते हैं आँखों में अश्क बनके कभी
कभी लबों पे तबस्सुम से खिलखिलाते हैं

ढूढते फिरते हैं खुद को किसी की आँखों में
थक के फिर नींद के आगोश में सो जाते हैं

बड़ी शिद्दत से निभाते हैं दुश्मनी अपनी
खुशनुमा रंग रफाक़त का भी दिखाते हैं

चांदनी रातों में चलते हैं साथ साथ कभी
अँधेरी रातों में आकर कभी डराते हैं

ले के चलते हैं कभी शहरे-ए-वफ़ा में हमको
झटक के हाथ कभी तन्हा छोड़ जाते हैं

ख़्याल प्रेम की बस्ती में जो आते हैं कभी
शबनमी किरणों के रंगों से झिलमिलाते हैं

©Prem Lata Sharma..8/2/2016

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